~ चार से छह…

~ डेस्टिनी…

हुआ यूं
उसको बुलाया
निकट बिठाया
चाय पिलाई
और फिर पूछा
ओ ज़िंदगी
क्यूं रहती है
तू
मुझसे रूठी

उसने भी
नज़रे उठाई
मुस्कुराई
और बोली
हट परे
पगले कहीं के
मैं रूठी
रत्ती भर नहीं

इक बात सुन
न मैं खुश न तू खुश
न ही हम है दुःखी
एक ही मकसद
हमारा
मौत इज़ द डेस्टिनी
हैव व्हिस्की
ऑर
टी…

~ उन दिनों…

उन दिनों मैं तेरा नमाज़ी था,

जब ख़ुदा भी मेरा सवाली था…

मैं दुआ के सिवाय क्या देता,

दिल भी दुनिया के जैसा खाली था…

दी दुआ बद्दुआ के बदले में,

इश्क़ अपना अजब मिसाली था…

वस्ल की मौज भी फरेबी थी,

हिज्र का दर्द भी ख़याली था…

कर गया बे-लिबास रूह मेरी,

जिस्म का पर्दा ही वो जाली था…